स्वर साधना क्या है, What is Swar Sadhna Indian Classical Music

 स्वर साधना क्या है, What is Swar Sadhna Indian Classical Music

What is Swar Sadhna
What is Swar Sadhna Indian Classical Music

स्वर के लयबद्ध रियाज़ को ही Swar Sadhna कहते हैं, गायन में गायक का सुरीला होना बहुत जरूरी होता हैं | कंठ (वाणी) को सुरीला बनाने के लिए Swar Sadhna आवश्यक है |

What is Swar Sadhna Indian Classical Music  –

कैसे करें और कितने दिन लगते हैं एवं Swar Sadhna क्यों जरूरी है, हिन्दुस्तानी म्यूजिक से जुड़े इन सभी प्रश्नों के उत्तर हम यहाँ जानने वाले है |

स्वर साधना किसे कहते हैं, Swar Sadhna-Indian Classical Music

आप सभी ने यह सुना होगा की हमें प्रतिदिन अभ्यास करना चाहिए, रियाज़ करना चाहिए, रियाज़ करने से गाने में चमक आती है | What is Swar Sadhna ? रियाज़ और अभ्यास दोनों एक ही शब्द के पर्यायवाची हैं, इसे उर्दू में रियाज़ और हिंदी में अभ्यास कहते हैं |

स्वर के लयबद्ध रियाज़ को ही Swar Sadhna कहते हैं  गायन में गायक का सुरीला होना बहुत जरूरी होता हैं | कंठ को सुरीला बनाने के लिए स्वर साधना आवश्यक है | अब बारी आती है कंठ के सुरीला होने की तो इसमें बहुत अंश तक ईश्वरीय प्रद्दत होता है, किन्तु गायन में आवाज़ को ऊपर नीचे ले जाना पड़ता है, इसलिए कंठ का ईश्वरीय प्रद्दत होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि रियाज़ के द्वारा उसे और भी सुरीला और गायन के योग्य बनाना होता है, जिसके लिए प्रतिदिन का रियाज़ अत्यंत आवश्यक होता है | Swar Sadhna Indian Classical Music.

Swar Sadhna करने के कुछ आवश्यक नियम –

१. स्वर साधना में कंठ का सुरीलापन – 

Swar Sadhna में  स्वरों को उनके उचित स्थान पर प्रयोग करने (बोलने) को सुरीलापन कहा जाता है तो सबसे पहले हमें हमें इस बात का ध्यान रखना होता है की जो भी स्वर हम लगा रहे हैं वो सही तरीके से स्वर पर लगे और फिर स्वर का रियाज़ प्रारंभ करें,  जिसे प्रतिदिन एक बैलेंस बनाकर करना होता है अर्थात नियमित तरीके से प्रतिदिन रियाज़ करना चाहिए | जिस प्रकार का प्रतिदिन का अभ्यास हम करेंगे उसी प्रकार का गायन भी हम परीक्षा या संगीत सभा या किसी भी लाइव कार्यक्रम में भी करेंगे | ऐसा जरूरी नहीं की इस प्रकार के अभ्यास से बेसुरा होने का भय नहीं है | इसलिए

Swar Sadhna  कैसे करते हैं?

 जब भी अभ्यास करें तो स्वर को सही तरीके से मिलाकर या अपने गुरुजनों के देख – रेख में ही करें, इससे बेसुरे होने से आप बचे रहेंगे | अन्यथा प्रतिदिन गलत अभ्यास होने से आप बेसुरे ही रहेंगे | अतः संगीत के प्रत्येक विद्यार्थी को बेसुरे की छाया मात्र से भी बचना चाहिए | कोशिश करें की अपनी क्षमता से ज्यादा प्रयास न करें क्योंकि ऐसी अवस्था में भी बेसुरे होने का भय रहता है |
अतः जब भी अभ्यास करें तो स्वर को सही तरीके से मिलाकर या अपने गुरुजनों के देख –   रेख में ही करें |

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२.स्वर साधना में श्वांस का महत्व – 

स्वर साधना में गायन में सांस का मत्वपूर्ण योगदान होता है अतः हमनें इसे नंबर दो पर रखा है | गायन के समय अनुचित स्थान पर सांस लेना या गाते समय जोर – जोर से सांस लेने से सुनने में बुरा लगता है एवं ताल भी छूट जाती है जो की गायन के लिए बुरा प्रभाव छोड़ता है | गाते समय किस प्रकार से और किस समय सांस लेनी चाहिए ? ये दोनों बाते ध्यान में रखनी चाहिए जिससे गायन में रंजकता आती है |

स्वर साधना के द्वारा स्वर को जायदा से ज्यादा लम्बा करने की क्षमता प्राप्त की जा सकती है | स्वर साधना करते समय एक स्वर पर एक सांस में जितनी देर तक रुकेंगे उतने समय तक सांस को लम्बा किया जा सकता है  |

 

३. स्वरों की मर्यादा बनाये रखना –

गायन के समय हमें अपने स्वरों की मर्यादाओं का पालन करना बेहद जरूरी होता है, गायन का ज्यादातर भाग मध्य सप्तक में ही रहता है, मन्द्र और तार सप्तक की आवश्यकता कम ही पड़ती है | तार सप्तक तक पहुचने के लिए हमें पहले मन्द्र सप्तक और फिर धीरे – धीरे तार सप्तक में अपना कंठ ज्यादा से ज्यादा दूर तक ले जाने की कोशिश करनी चाहिए |

हमें सिर्फ कोशिश करनी चाहिए जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए, नहीं तो गले को नुकसान भी हो सकता है तो अपनी क्षमता के हिसाब से ही तार सप्तक में जाएँ | स्वरों के फैलाव को धीरे – धीरे, ऊपर – नीचे बढ़ाना चाहिए और अपनी आवाज के साथ जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए |  गलत ढंग से रियाज़ करने से आवाज़ में बहुत से दोष आते हैं, इसलिए मैंने ऊपर की लाइन में भी बताया है कि  जब भी अभ्यास करें तो अपने गुरुजनों के देख – रेख में ही करें |

  ४. सुरीलापन के साथ मधुरता –  

गायन में सिर्फ सुरीला होना ही मायने नहीं रखता उसके साथ – साथ गायन में मधुरता भी होनी चाहिए और प्रतिदिन के रियाज़ (स्वर साधना) से हम अपने स्वर में मधुरता ला सकते हैं | कुछ दोषों को रियाज़ से हटा दिया जाए तो हम गले में मधुरता भी ला सकते हैं | जैसे – सही तरीके से स्वर न लगाना, स्वर में लड़खड़ाहट, स्वर में अस्वाभाविक कम्पन आदि  |

तो हमने आपको स्वर साधना क्या है, What is Swar Sadhna  कैसे करते हैं, और इसके नियम क्या हैं ? इन सभी बातों को बताया है इन बिन्दुओ पर अमल करके आप Swar Sadhna कर सकते हैं  अब बारी आती है स्वर साधना कब तक करें |
तो एक कहावत है “गाये गीत बजाये बाजा ” मतलब जब तक आप गाते रहेंगे तबतक आपका गायन बेस्ट रहेगा और जब आप इसे छोड़ देंगे तो मानव मष्तिस्क की क्षमता आपको पता ही है भूलने में नंबर एक है | एक और कहावत आपको पता होगी “करत – करत अभ्यास के जड़मत होत सुजान रसरी आवत जात के सिल पर पड़त निशान” |

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            संगीत किसी तालाब का नाम नहीं बल्कि यह एक समुद्र है जिसमें तैरने वाला फेल और डूबने वाला पास हो जाता है जितना इसकी गहराई में जायेंगे उतना ही श्रेष्ठ होते जायेंगे | तो जितना दिन तक आप संगीत साधना करते रहेंगे आप के लिए उतना ही उत्तम होगा |

“आशा करता हूँ यह स्वर साधना क्या है, What is Swar Sadhna जानकारी आपको अच्छी लगी होगी |”
 
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धन्यवाद्

-पवन शास्त्री

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